21वीं सदी के प्रमुख उपन्यासों में पर्यावरणीय चेतना

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प्रस्तुत कृति में लेखिका ने 21वीं सदी के प्रमुख हिंदी उपन्यासों के माध्यम से पर्यावरणीय चेतना के विविध पक्षों का गंभीर एवं शोधपरक अध्ययन किया है। पुस्तक में पर्यावरण की अवधारणा एवं स्वरूप से लेकर साहित्य और पर्यावरण के अंतःसंबंध, हिंदी उपन्यास की विकास-यात्रा तथा समकालीन उपन्यासों में अभिव्यक्त पर्यावरणीय विमर्श तक को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया है।

विशेष रूप से ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’, ‘कुईयाजान’, ‘हिडिम्ब’, ‘लक्ष्मणरेखा’, ‘एक ब्रेक के बाद’, ‘मीठी नीम’, ‘वृंदा’, ‘एक उम्मीद और’, ‘रेखना मेरी जान’, ‘वर्षावन की रूपकथा’, ‘पठार पर कोहरा’ और ‘धार’ जैसे उपन्यासों के संदर्भ में पर्यावरणीय सरोकारों का विवेचन इस पुस्तक को समकालीन हिंदी साहित्य के पर्यावरणीय अध्ययन की दृष्टि से उपयोगी बनाता है। वन, जल, भूमि, जैव-विविधता, प्राकृतिक आपदाओं, प्रदूषण तथा पारिस्थितिकीय असंतुलन के साथ-साथ विस्थापन, आजीविका, आर्थिक संकट, सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक संबंध, स्वास्थ्य, गरीबी और सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले पर्यावरणीय संकट के प्रभावों को भी लेखिका ने अध्ययन का हिस्सा बनाया है।